1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम (indian Council act, 1861)

Indian Council Act, 1861
1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार को शासन में भारतीयों का सहयोग आवश्यक लगा। 1 अगस्त 1861 से लागू 1861 का भारतीय परिषद अधिनियम भारतीय संवैधानिक एवं राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अधिनियम था।  अत: उक्त अधिनियम में निम्न प्रावधान किए गए।

🆕विशेषताएं – 
➡️ वायसराय की विस्तारित विधान परिषद में गैर सरकारी सदस्यों के रूप में भारतीयों का नामांकन संभव हुआ। 
सन 1862 में प्रथम बार लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों –  बनारस के राजा,  पटियाला के राजा व दिनकर राव को विधान परिषद में नामांकित (मनोनीत) किया। 
➡️ मुंबई और मद्रास प्रांत को अपनी विधायी शक्तियां वापस मिली अर्थात् विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया दुबारा शुरू हुई। इस अधिनियम ने रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा शुरू हुई केंद्रीकरण की प्रवृत्ति को उलट दिया। 
➡️ इस अधिनियम के माध्यम से बंगाल, उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत और पंजाब में क्रमशः 1862,1866 और 1897 में विधान परिषदों का गठन हुआ। इसी अधिनियम द्वारा विकेंद्रीकरण का प्रारंभ हुआ। 
➡️ इसमें वायसराय को परिषद ने कार्य संचालन के लिए अधिक नियम व आदेश बनाने की स्वतंत्रता दी गई।
सन् 1859 में लॉर्ड कैनिंग द्वारा प्रारंभ की गई पोर्टफोलियो (मंत्रालय) प्रणाली को मान्यता दी अर्थात् वायसराय की परिषद का कोई सदस्य एक या अधिक सरकारी विभाग का प्रभारी बनाया जा सकता था तथा उसे परिषद की ओर से अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार था।  
➡️ इस अधिनियम में आपातकाल में वायसराय को विधायी परिषद की सलाह के बिना अध्यादेश लागू करने की शक्ति दी गई। जिसकी अवधि 6 माह थी। 
➡️ इस अधिनियम द्वारा गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में सदस्यों की संख्या 4 से बढ़ाकर पांच कर दी गई। पांचवा सदस्य विधि सदस्य सम्मिलित किया गया। 
➡️ पोर्टफोलियो (मंत्रालय) व्यवस्था को वैधानिक मान्यता प्रदान की। 
🆕 कमियां
➡️  ये प्रतिनिध्यात्मक नहीं थी। 
➡️ केवल (only) वायसराय के द्वारा रखे गए प्रस्ताव पर चर्चा का अधिकार था। 
➡️ वायसराय की इच्छा से ही बिल (bill) प्रस्तुत किया जा सकता था। 
➡️ विधेयक के पास होने पर भी वायसराय को वीटो का अधिकार था तथा राजमुकुट (ताज) के विचारार्थ रखने लेने का भी अधिकार था। 
➡️ वायसराय को अध्यादेश का अत्यंत व्यापक अधिकार दिया गया था। 
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