🆕🆕 ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद व वेदांग के बारे में विस्तार से जानकारी 🆕🆕

ब्राह्मण ग्रंथ :-
✍️ ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञ उत्सव/यज्ञ विज्ञान तथा प्रार्थना से संबंधित ग्रंथ है। इनका विषय कर्मकांड से संबंधित है तथा ब्राह्मण ग्रंथों की भाषा गद्यात्मक है।

✍️ प्रमुख ब्राह्मण ग्रंथ जो वेदों से संबंधित है। 👇👇👇
ऐतरेय एवं कौशितकी / सांख्यायन ब्राह्मण ग्रंथ ऋग्वेद से संबंधित है।
तैत्तिरीय एवं शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ यजुर्वेद से संबंधित है।
षडविंश अर्थात् अद्भूत, तांड्य अर्थात् महा ब्राह्मण, पंचविंश तथा जैमिनीय ब्राह्मण ग्रंथ सोमवेद से संबंधित है।
गोपथ ब्राह्मण ग्रंथ अथर्ववेद से संबंधित है।

✍️ ताण्ड्य ब्राह्मण ग्रंथ प्राचीनतम ब्राह्मण ग्रंथों में से एक है इस ब्राह्मण ग्रंथ में व्रात्यस्तोम उत्सव (फेस्टिवल) का उल्लेख है जिसके द्वारा अनार्यों को आर्य बनाया जाता था।

✍️ सभी ब्राह्मण ग्रंथों में सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण (important) ब्राह्मण ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में यज्ञ के साथ – साथ उत्तर वैदिक कालीन धर्म-दर्शन,  खानपान,  रहन-सहन और रीति-रिवाज का भी उल्लेख मिलता है।

✍️ अग्निष्टोम व अश्वमेघ जैसे यज्ञों के विधि – विधान की जानकारी गोपथ (gopat) ब्राह्मण ग्रंथ में मिलती है।

आरण्यक :-
आरण्यक ग्रंथों का लेखन –  पठान (पठन – पाठन) जंगलों (फॉरेस्ट) में होने के कारण इन्हें आरण्यक कहते हैं। आरण्यक का मुख्य विषय (subject) आध्यात्मिक/रहस्यात्मक तथा दार्शनिक/ज्ञान चिंतन है। इस ग्रंथ का प्रमुख मार्ग ज्ञान मार्ग हैं। आरण्यक में एक ओर संहिताओं व ब्राह्मणों के मिथकों एवं कर्मकाण्ड (विधि-विधान) का तथा दूसरी (दुसरी तरफ) ओर उपनिषदों के दर्शनों का संक्रमण मिलता है। प्रमुख आरण्यक (वन ग्रंथ)  – ऐतरेय, सांख्यायन, तैत्तिरीय,  वृहदारण्यक,  जैमिनीयोपनिषदारण्यक,  छान्दोग्य आरण्यक व कौशितकी आरण्यक।

उपनिषद् :-
✍️ उपनिषद वैदिक कालीन दार्शनिक (ज्ञान) ग्रंथ है। इसमें आत्मा,  परमात्मा,  ब्रह्म तथा जीवात्मा के बीच संबंध, विश्व की उत्पत्ति, प्रकृति के रहस्य तथा अन्य विषयों (other subjects)  पर दार्शनिक (ज्ञान) चिंतन है। इनमें कर्मकाण्डों (विधि – विधान) की विशेष आलोचना एवं सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् विश्वास के मूल्यों पर बल दिया गया है उपनिषद की मुख्य विषय (मैन सब्जेक्ट)  वस्तु ज्ञान से संबंधित है।

✍️ मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार उपनिषदों की कुल संख्या 108( एक सौ आठ)  बताई गई है लेकिन वर्तमान में प्रमाणिक 12 उपनिषद् माने जाते हैं।

प्रमुख 12 उपनिषद् :-
ऐतरेय व कौशितकी उपनिषद् ऋग्वेद से संबंधित है।
छांदोग्य एवं केन उपनिषद सोम वेद से संबंधित है।
तैत्तिरीय,कथा,श्वेताश्वतर,ईष व बृहदारण्यक उपनिषद् यजुर्वेद से संबंधित है।
मुंडक,प्रश्न, व माण्डुक्य उपनिषद् अथर्व वेद से संबंधित है।

✍️ छांदोग्य उपनिषद में अद्वैत दर्शन का सबसे प्राचीनतम एवं स्पष्ट रुप मिलता है।

✍️ पुनर्जन्म का विचार सबसे पहले बृहदारण्यक उपनिषद के पूरक खंडों तथा विस्तृत रूप में छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।

✍️ उपनिषद मीमांसात्मक ग्रंथ है।

✍️ सृष्टि की उत्पत्ति एक आत्मा या ब्रह्म से हुई है इसका उल्लेख माण्डुक्य उपनिषद् में मिलता हैं।

✍️ गीता के निष्काम कर्म का सर्वप्रथम प्रतिपादन ईशोपनिषद् में मिलता है।

✍️ कठोपनिषद् में एक जगह उल्लेख है कि आत्मा का कभी ने तो जन्म होता है और ना कभी मृत्यु होती है अर्थात् आत्मा अजर अमर है।

✍️ यम –  नचिकेता के संवाद का उल्लेख कठोपनिषद में मिलता है।

✍️ भगवान कृष्ण का प्राचीनतम उल्लेख तथा कृष्ण को अंगी रस का शिष्य बताया गया है इस बात का उल्लेख छांदोग्य उपनिषद में मिलता है। बौद्ध धर्म के पंचशील सिद्धांत का उल्लेख भी छांदोग्य उपनिषद में मिलता है।

✍️ बौद्ध धर्म के अष्टांगिक मार्ग का उल्लेख ऐतरेय उपनिषद में मिलता है।

✍️ याज्ञवल्कय – गार्गी संवाद का उल्लेख  वृहदारण्यक उपनिषद् में मिलता है।

✍️ चार आश्रमों का उल्लेख जाबालोपनिषद में मिलता हैं।

वेदांग या सुत्र साहित्य :-
वेदांगों की रचना वेदों के अध्ययन एवं उनके बारे में विस्तृत जानकारी के लिए की गई।
वेदांगों की कुल संख्या 6 (six) है।

✍️ शिक्षा/स्वर विज्ञान :- इसमें स्वर, वर्ण आदि के शुद्ध उच्चारण का प्रतिपादन है। पाणिनीय शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण स्वर विज्ञान हैं।

✍️ कल्प/कर्मकाण्ड :- इसमें पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन के नियम,  संस्कारों और कर्तव्यों का वर्णन है। इस वेदांग के तीन भाग हैं – श्रोत कल्प, गुह्य कल्प, एवं धर्म कल्प।
✍️ व्याकरण :- इसकी रचना भाषा के वैज्ञानिक ज्ञान हेतु की गई।

✍️ निरुक्त/व्युत्पत्ति :- इसमें शब्दों की व्युत्पत्ति का उल्लेख है। इस वेदांग का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ यास्क है।

✍️ ज्योतिष :- इस वेदांग में ज्योतिष विज्ञान का विधान है। ‘ज्योति वेदांग’ ज्योतिष वेदांग का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

✍️ छन्द :- विभिन्न छन्दों के समुचित ज्ञान हेतु छंद वेदांग की रचना हुई है। छन्द ग्रंन्थों में आचार्य पिंग्ल द्वारा रचित ‘छन्द सूत्रा’  महत्वपूर्ण है

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